खिलाफत और असहयोग आंदोलन का परिचय
- वर्ष 1919-1922 में भारत में ब्रिटिश शासन के विरोध में दो जन आंदोलन शुरू किये गए –
- खिलाफत आंदोलन
- असहयोग आंदोलन
- दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग- अलग थे लेकिन दोनों में ही अहिंसा और असहयोग को अपनाने के कारण उनमे प्रायः एकीकरण था।
- आंदोलन के दौरान कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने भी एकीकृत हो कर काम किया और अपने संयुक्त प्रयासों से कई राजनीतिक प्रदर्शनों को अंजाम दिया।
असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ?
असहयोग आंदोलन की शुरुआत सितम्बर 1920 में कांग्रेस के कलकता के विशेष अधिवेशन में हुई। इस अधिवेशन के अध्यक्ष- लाला लाजपत राय थे।
गाँधीजी ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया। कांग्रेस के अनेक महत्वपूर्ण नेताओं ने इसका विरोध किया शंकरन नायर जैसे सी० आर० दास, जिन्ना, बिसेंट ,विपिन चन्द्र पॉल, मालवीय आदि। फिर भी गाँधीजी ने अली बन्धुओं व मोतीलाल नेहरू के समर्थन से यह प्रस्ताव पारित करवा लिया।
दिसम्बर 1920 के कांग्रेस अधिवेशन में ( नागपुर, विजय राघवाचारी) इस प्रस्ताव की पुष्टि हो गई। है, इस बार प्रस्ताव सी०आर० दास ने ही प्रस्तुत किया था। जब असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ तो इसके विरोध में जिन्ना, बिसेंट व विपिन चन्द्र पाल ने कांग्रेस छोड़ दी।
नागपुर अधिवेशन का ऐतिहासिक महत्व इसलिये है क्योंकि यहाँ पर वैधानिक साधनो के अन्तर्गत स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को त्यागकर सरकार के सक्रिय विरोध करने की बात को स्वीकार किया गया।
असहयोग प्रस्ताव की मुख्य बातें –
- सरकारी उपाधि व अवैतनिक सरकारी पदों का त्याग किया गया।
- सरकारी स्कूलों, कॉलेजो तथा वकीलों द्वारा न्यायालयों का बहिष्कार
- विदेशी सामानों का पूर्णतः बहिष्कार
- असैनिक श्रमिक व कर्मचारी वर्ग मेसोपोटामिया में जाकर नौकरी करने से इन्कार करें।
- आपसी विवाद पंचायती अदालतों द्वारा निपटाया जाये।
असहयोग आंदोलन के कारण और परिणाम
- 1916 के लखनऊ समझौते के बाद से ही कांग्रेस का मानस एक बड़ा जन आन्दोलन करने का था।
- प्रथम विश्वयुद्ध –
- विश्व युद्ध के दौरान मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हुई जिससे जन सामान्य को जीवन चलाने में असहजता हुई।
- युद्ध खर्च की वसूली के लिये सरकार ने अनेकानेक कर लगाए।
- युद्ध में अधिकाधिक सैनिकों की भर्ती की जिन्हें युद्ध के बाद हटा दिया गया जिससे बेरोजगारी फैली।
- विदेशी मोर्चे पर यूरोपीयों से मुकाबला करने से यूरोपीयों की श्रेष्ठता की धारणा ध्वस्त हुई । भारतीय सैनिकों का आत्मविश्वास बढ़ा।
- युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों, आत्म सम्मान का प्रचार किया जिससे बुद्धिजीवी वर्ग की उम्मीदे बढ़ी किन्तु उम्मीदें पूरी न होने पर लोगों में असंतोष फैला।
- होमरूल आन्दोलन –
- संगठनात्मक ढाँचा खड़ा किया।
- राजनैतिक चेतना का विस्तार।
- नेतृत्व विहिनता के कारण यह अंजाम तक नहीं पहुँचा इससे भारतीय जनता में असंतोष उत्पन्न हुआ जिसकी अभिव्यक्ति असहयोग आन्दोलन में हुई ।
- रोलेट एक्ट –
- सत्याग्रह आन्दोलन से चेतना का विकास
- जलियाँवाला बाग काण्ड का आक्रोश
- हण्टर समिति की निर्लज्ज रिपोर्ट
- खिलाफत आन्दोलन-
- हिन्दू- मुस्लिम एकता कायम
- मुस्लिम समाज ब्रिटिश शासन के विरूद्ध लाभबन्द हुआ।
- चम्पारण, खेड़ा व अहमदाबाद आन्दोलनों की सफलता से गाँधीजी के रूप में सशक्त नेतृत्व मिला।
- मांटेग्यू- चेम्सफोर्ड सुधारों से निराशा
1 अगस्त 1920 से असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ । 4 आना की मदस्यता शुल्क के साथ कांग्रेस के दरवाजे जनसामान्य के लिये खोल दिये गये। 15 सदस्यीय कार्यसमिति बनाई गई जो कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती थी।
5 फरवरी 1922 को गोरखपुर (U.P.) में चौरी-चौरा नामक स्थान पर उग्र भीड ने 22 लोगो को जिन्दा जला दिया। इसलिये गाँधीजी ने 12 feb. 1922 को आन्दोलन वापस ले लिया। कांग्रेस के बड़े नेताओ ने इसका विरोध किया। गांधीजी को गिरफ्तार कर धारा 124 (A) के तहत राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया व 6 साल की सजा हुई, परन्तु 2 साल बाद ही खराब स्वास्थ्य की वजह से रिहा करना पड़ा।
असहयोग आंदोलन कब समाप्त हुआ?
असहयोग आंदोलन 1922 में समाप्त हुआ। महात्मा गांधी ने इसे फरवरी 1922 में वापस ले लिया। आंदोलन वापस लेने का मुख्य कारण चौरी चौरा कांड (गोरखपुर- उत्तरप्रदेश) था, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर 4 फरवरी 1922 को हुआ।
असहयोग आंदोलन वापसी का कारण माना जाने वाला चौरी चौरा कांड क्या था?
इस घटना में आंदोलनकारियों की एक भीड़ ने हिंसक रूप ले लिया और एक पुलिस थाने को आग लगा दी। इस आगजनी में 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
इसके बाद गाँधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया। महात्मा गांधी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने के लिए अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है।
चौरी चौरा की घटना में हिंसा के कारण गांधी जी को लगा कि लोग आंदोलन की अहिंसात्मक प्रकृति को नहीं समझ पाए हैं। इसलिए उन्होंने यह आंदोलन तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया।
असहयोग आंदोलन वापस क्यों लिया गया?
असहयोग आंदोलन वापस लेने के कारण-
- आन्दोलन हिंसक हो गया था व हिंसक होने से-
- यह गलत हाथों में जा सकता था जिससे पूरा आन्दोलन ही दिग्भ्रमित हो जाता।
- ब्रिटिश सरकार इसे आसानी से कुचल देती।
- गांधीजी को अपने मूल्य या आदर्श स्वराज्य मे अधिक प्रिय थे तथा वे किसी भी कीमत पर इन आदर्शों के साथ समझौते को तैयार नहीं थे, चूँकि आन्दोलन इन आदर्शों से भटक गया था, अत: इसे वापस लेना ही था।
- गांधीजी की रणनीति थी- ‘संघर्ष – विराम संघर्ष’। चूँकि यह आन्दोलन लम्बे समय से चल रहा था अत: लोग थक गये व निष्क्रिय होते जा रहे थे, अत: इससे पहले कि आन्दोलन स्वत: बन्द हो जाये, गाँधीजी ने इसे वापस ले लिया।
- खिलाफत आन्दोलन भी तुर्की में सत्ता परिवर्तन के बाद अप्रांसगिक हो गया था अत: मुस्लिम समाज आन्दोलन से विमुख हो चला था।
- भारतीय समाज में आन्तरिक अन्तर्विरोध बढ़ता जा रहा था – जैसे कि-
- पूंजीपति – मजदूर
- किमान – जमींदार
- हिन्दू – मुस्लिम
- दिस. 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें ‘कर न अदायगी’ को भी शामिल किया गया। सम्मेलन के बाद से ही गांधीजी पर सविनय अवज्ञा शुरू करने का दवाब बढ़ता जा रहा था जबकि गाँधी जी जानते थे कि उन परिस्थितियों में यह आन्दोलन नहीं किया जा सकता था।
असहयोग आंदोलन का महत्व और विशेषताएं
- यह सही मायने में अखिल भारतीय आन्दोलन था तथा नगरो के साथ – साथ गाँवो में भी पहुँचा था।
- इसमें समाज के अनेक वर्गों ने योगदान दिया। जैसे- किसान, मजदूर, पूंजीपति, महिलाऐं।
- यह अन्तिम आन्दोलन था जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता दिखाई दी।
- गाँधीजी के सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह जैसे औजार राष्ट्रीय – आन्दोलन को मिले।
- गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम लोकप्रिय हुये चरखा कातना, हिन्दू- मुस्लिम एकता, सामाजिक समानता, महिला सशक्तिकरण।
इस कारण न केवल राष्ट्रीय आन्दोलन के आदर्शों में व्यापकता आई बल्कि सामाजिक विकास हुआ तथा रूढ़िवादिता दूर आई ।
असहयोग आन्दोलन की कमियां
- इस आन्दोलन का उद्देश्य सीमित था । यद्यपि इसमें स्वराज्य की बात कही गई थी किन्तु इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया।
- इसका क्षेत्रीय विस्तार सीमित था। महाराष्ट्र व मद्रास इससे अछूते रहे थे।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता भी आन्दोलन के आरम्भिक दौर में रही परन्तु यह भी स्थाई नहीं थी क्योंकि 1923-24 में दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। मोपला विद्रोह जो भी इसी आन्दोलन का भाग था, साम्प्रदायिक रूप ले लेता है।
- यह आन्दोलन पूरी तरह से अहिंसक नहीं था, जगह – जगह पर इसने हिंसक रूप धारण कर लिया जैसे :-
- मोपला विद्रोह
- चौरी चौरा हत्याकाण्ड
- बॉम्बे में प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा के समय समर्थको व विरोधियों में झड़प।
- आंदोलन के प्रारम्भ में गांधीजी ने एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्ति का लक्ष्य रखा था। परन्तु बेनतीजा रहा।
- बहिष्कार भी केवल विदेशी वस्तुओं तक ही सिमित रहा।